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Wednesday, 17 September 2014

(8) आग ! (क) ‘दावानल’ (i) सुलगती ‘अनल’ !

 (सरे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार)

आग के लिए चित्र परिणाम
                              ठण्डे-ठण्डे हृदयों में यों भीतर पनपी ‘आग’ !

हरे-भरे ‘वन’ में ‘दावानल’ जैसे जाता जाग !!
सुमनों की शैय्या’ पर सोती, ‘प्रिया’, ‘पिया’ के साथ-

‘वित्त्वाद’ के ‘जाल’ में फँस कर, ‘लोभी’ हुआ ‘सुहाग’ !!

  लेकर हाथों में ‘हथगोले’, या लेकर ‘बन्दूक’ !

मारेंगी ‘दहेज़-दानव’ को, पोंछ के अपनी ‘माँग’ !!


‘कोयलिया’ ‘वधिकों’ को काटेगी, पैनी कर ‘चोंच’ !

नहीं सुनायेगी ‘वसंत’ के, ‘मीठे-मीठे राग’ !!

‘पवन’ की ‘गति’ से ‘घोर गरजना-मय’ होंगे ‘संघट्ट’ !!
‘शीतल बादल’ में पनपेंगे, ‘बिजली’ के ‘प्रतिराग’ !!

बहुत सँभल कर ‘विचरण’ करना, हो करके ‘चैतन्य’ !
‘बर्रों के छत्तों’ से सारा भरा हुआ है ‘बाग’ !!

‘जेठ की दोपहरी’ में झुलसे, सारे खिले “प्रसून” !

कैसे गायें ‘बुलबुल-कोयल’, ‘मधुर बसन्ती फाग’ ??


 


2 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 18-09-2014 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1740 में दिया गया है ।
    आभार ।

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