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Friday, 29 August 2014

गज़ल-कुञ्ज (4) झरबेरी-गुलाब (ख) रहे गुलाब दुखी हो बोल !

 (सरे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार)
    

रहे गुलाब दुखी हो बोल !

"
ऐ झरबेरी धीरे डोल !!

"तू तो अपनी मौज में है-

घायल मेरे अधर कपोल !!

"चुभते तेरे शूल मुझे -

मत कर इतना निठुर किलोल !!

"तू खुशियों में झूम रही- 

मेरी खुशियाँ डाबाडोल !!

"
काँटों का दोनों का तन - 

तेरा मेरा एक न मोल !!

"
तू घायल कर देता है-

लेता जिसका बदन टटोल !!

"
गुठली पर जब दाँत लगे-

खुल जाती है तेरी पोल !!

कोमल है इतिहास मेरा –

तेरा काँटों का भूगोल !!

"जो मेरे "प्रसून" को छू ले –

देता मैं मन में रस घोल !!"




4 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (30-08-2014) को "गणपति वन्दन" (चर्चा मंच 1721) पर भी होगी।
    --
    श्रीगणेश चतुर्थी की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete
  2. सुंदर प्रस्तुति

    ReplyDelete

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