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Monday, 30 June 2014

गज़ल-कुञ्ज (1) प्रणाम (क) प्रियतम-प्रणाम (i) हे प्रियतम पूर्ण निर्विकार !

मित्रो ! मेरा गज़लों-शैली पर 'ग़ज़ल-कुञ्ज' के नाम से एक ग्रन्थ पूरा होने के निकट है | इसकी एक-एक रचना समय-समय पर प्रारम्भ से अन्त तक प्रकाशित करना चाहूंगा |आशा है कि आप इतने लम्बे समय के बाद 
लम्बी  बीमारी से छूट कर आप के रूबरू होने पर मेरा साथ पुन: देंगे !


तुम प्रकाश,तुम हो अन्धकार ! 
    हे प्रियतम पूर्ण निर्विकार !!
निगमागम तुम्हीं अपारगम्य |
   पा सकता तुम से कौन पार ??
प्रियतम तुम ब्रह्म,तुम्हीं माया-
   तुम असत्,किन्तु तुम सत् अपार ||
तुम हो समष्टि,हो व्यष्टि तुम्हीँ-
  आकार-हीन तुम महाकार ||            
   
निष्काम,कामना हो सब में-
  संसृति तुम, फिर भी हो असार ||
तुम परम शून्य, तुम हो अनंत-
  निर्गुण तुम, फिर भी गुणाकार ||
  
प्रिय, 'अस्तिनास्ति'से परे हो तुम-
  तुम को प्रणाम शत कोटि बार ||
 
अनिकेत, व्याप्त हो कण कण में-
  सब के आधार हो निराधार ||
 
है "प्रसून", प्रियतम, शरणागत !
भव-सिंधु से कर दो इसे पार !! 



3 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (01-07-2014) को ""चेहरे पर वक्त की खरोंच लिए" (चर्चा मंच 1661) पर भी होगी।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. आध्यात्म का पुट लिए सुन्दर शेर हैं सभी ... बधाई ...

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