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Friday, 14 November 2014

(14) सभ्यता (क) सभ्यता इसी को कहते हैं !


 

 

‘फूलों’ में ‘काँटे’ रहते हैं |


वे इक-दूजे को सहते हैं ||

 

 

दोनों में ‘समझौता’ हो जब-


‘सभ्यता’ इसी को कहते हैं ||

 

 

हम ‘भले-बुरे’ का निवाह कर-


अनवरत ‘नदी’ से बहते हैं ||


                                           

 

 

जब तक न ‘मिलन’ हो ‘सागर’ से-


तब तक क्या रुकना ! चलते हैं ||

 

 

खुद भी चलते अपनी ‘मंजिल’-


औरों को चलने देते हैं ||

 

 

‘गैरों’ के लिये हमारे तो-


‘अरमान’ दिलों में पलते हैं ||

                                  

  ‘रस-रुप-गन्ध’ जो सब पायें-


‘जीवन’ के “प्रसून” खिलते हैं ||


Tuesday, 1 July 2014

गज़ल-कुञ्ज (1) प्रणाम (क) प्रियतम-प्रणाम (ii) प्रियतम तुमको मेरा प्रणाम !


तुम अनाम फिर भी कोटिनाम |
प्रियतम तुमको मेरा प्रणाम !!

निर्बाध 'काल'की गति मन्थर-
रोकते उसे भी दे विराम ||
 
कण कण में तुम रमते हो यों-
कहते तुमको लोग राम |


कामना-हीन निष्काम हो तुम !
पर तुम हो अनन्त सत्य काम ||
 
अनिकेत’, किन्तु सर्वत्र व्याप्त |
‘जड़-चेतन’ सबके परम धाम ||

जो मिले, तुम्हारी ‘कृपा-गन्ध’-
हो जाये 'प्रसून' धन्य नाम ||

                                              


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