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Tuesday, 7 October 2014
(9) ‘धर्म-गिद्ध’ !
हिंसक
कुछ ‘धर्मों के गिद्ध’ नज़र आते हैं !
दुखी
यों ‘गान्धी’, ’नानक’ ‘बुद्ध’ नज़र आते हैं !!
‘स्नेह-हंस’,
वानों से बिद्ध नज़र आते हैं !!
‘जाहिल’
कुछ ऊपर से, ‘प्रबुद्ध’ नज़र आते हैं !!
‘मज़हब’
के सुलग रहे ‘युद्ध’ नज़र आते हैं !!
‘पर्दे’
में ‘वासना’ के ‘गिद्ध’ नज़र आते हैं !!
कितने
अखबारों में ‘प्रसिद्ध’ नज़र आते हैं !!
Saturday, 4 October 2014
(8) आग ! (ग) जठारानल (भूख की आग) (iii) दहक रहे ‘अंगार’ !
(सरे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार)
‘जठर’ से
बढ़ कर ‘गर्म आग है और नहीं संसार में !
‘तहज़ीबें’
जल जातीं इसके, दहक रहे ‘अंगार’ में !!
जब जलती
है ‘काम’ की ‘ज्वाला’, सारी ‘शान्ति’ जलाती है !
आग लगा
देती है ‘मीठे मीठे मोहक प्यार’ में !!
यह न
बुझी तो, ‘अरमानों’ को झुलसा कर रख देती है !
‘अनुबन्धों’
को ‘जला-जला’ कर बदला करती ‘क्षार’ में !!
‘झुग्गी’ में रहता जो भीखू, उसका थोड़ा ‘हाल’
सुनो !
भूख लगी
तो, ले आता है’ जो भी मिला उधार में !!
अपनी
‘कुण्ठा’ भरी ‘कसक’ को, दबा नहीं जब पाता है !
‘डूब-डूब’
कर ‘होश’ गँवाता, ‘लालपरी’ के प्यार में !!
‘भूख’ का करके रोज़ बहाना, माँग-माँग कर लाता
है-
रोज़
शाम ‘भट्टी’ पर जाता, है वह मुआ बज़ार में !!
उसकी
‘अर्द्ध अंगिनी’ उसका, आधा ‘बोझ’ उठाती है !!
नित्य
किसी ‘बंगले’ पर जाती, बैठ चमकती कार में !!
‘रुप-सुधा-रस-पान’
करा कर, जो मिलता, ले आती है !
बड़ी
‘कुशल’ है, ‘लाज की कलियों’ के ‘कामुक व्यापार’ में !!
सात-आठ
बच्चों की ‘जननी’, उनमें कुछ भीखू के हैं !
किस बच्चे
का कौन ‘पिता’ है, कौन पड़े इस ‘रार’ में !!
हर दिन
हर ‘मौसम’ में उनका, ‘रोग’ से ‘नाता’ रहता है !
कोई
खुजली, पेट-दर्द में, कोई दुखी बुखार में !!
पड़ी हुई
अधजली बीडियाँ, कोई उठा के पीता है !
कोई ज़ेब
काटता फिरता, आवारा बेकार में !!
इनका
‘जीवन’ कौन सुधारे, कौन सिखाये ‘ज्ञान’ इन्हें ?
“प्रसून”,
किसको ‘समय’, ‘व्यस्त’ हैं सारे लोग ‘सुधार’ में !!
Friday, 3 October 2014
(8) आग ! (ग) जठारानल (भूख की आग) (ii) ‘समय’ नहीं है पास !
(सरे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार)
‘तोते’ कहते, “आकर सुन ले, मेरे ‘मन्त्र’, ‘बटेर’ !”
‘बटेर’
कहती, “ ‘पेट’ है खाली, मुझको अभी न टेर !!”
गाँव
में ‘नेता’ ‘सम्मलेन’ की जब करते हैं ‘बात’-
कहते
‘भीखू-मीकू’, “देखो हमको लिया है घेर !!
‘सभा-गोष्ठी’
में जाने का ‘समय’ नहीं है पास-
“खेत
में ‘पानी’ देने जाना, होती हमें अबेर !!
“ ‘होली के त्यौहार में भय्या सुन लेंगे हम
‘बात’-
‘समय’
निकालो, ‘दिल्ली’ तज कर, आना ‘देर-सबेर’ !!
“इसी
गाँव में ‘राजनीति’ के, एक हैं ‘ठेकेदार’-
बहुत
‘बड़ी चौपाल’ है उनकी, जिसका पक्का घेर !!
“जाओ
उनके पास, लगाओ ‘मक्खन’-मस्का मार-
अपने एक
‘इशारे’ पर वे, ‘किस्मत’ देंगे फेर !!”
‘चुनाव के मौसम’ में झुक कर, करते हमें ‘प्रणाम’
!
फिर
‘कारों’ से नहीं उतरते, कितना है ‘अन्धेर’ !!
बच के
रहना, छुपे हुए हैं ‘काँटों के अम्बार’-
‘ऊपर-ऊपर’
लगे ‘सुहाने फूलों के हैं ढेर’ !
“प्रसून”
अपने ‘स्वार्थ’ में ये, लगते ‘लोमड़-स्यार’-
जीत गये
तो बन जाते हैं, बिल्कुल ‘बब्बर शेर’ !!”
Thursday, 2 October 2014
(8) आग ! (ग) जठारानल (भूख की आग) (i) न ‘पानी’ न ‘खाद’ !
(सरे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार)
जब तपती
है कभी ‘उदर’ में, ‘भूख’ की तपती ‘आग’ !
नहीं
सुहाते ‘मल्हार-सावन’ के ‘रस-भीने राग’ !!
‘जठर-अनल’ की मज़बूरी से, ‘कलियाँ’ हैं लाचार !
कामुक
‘भंवरों’ की ‘बाहों’ में ‘लुटते’ रोज़ ‘पराग’ !!
‘आटा-चावल’
उधार लायी, जोड़-जोड़ कर हाथ !
और
‘मुफ़्त’ का तोड़ के लायी, जंगल से कुछ साग !!
तब उस
‘बुढ़िया’ के घर ‘चूल्हा’ जला, पक सका ‘भात’ !
तीन
दिनों के बाद मिल सका भोजन, जागे ‘भाग’ !!
ऐसे में
क्या ‘धर्म’ के भायेंगे उसको ‘उपदेश’ ??
उसको
लगते ‘उपदेशक’ यों, जैसे बोलें ‘काग’ !!
नहीं
पुराने ‘कपड़े’ भी थे, कटा ‘पूस का मास’ !
क्या
खेलेगा ‘नंगा-भूखा बुधुआ’ ‘रस-मय फाग’ !!
‘नेता’
कहते हैं ‘भाषण’ में, “इसे मिटायें आप !
विकास
के तन पर ‘निर्धनता’, एक ‘बदनुमा दाग’ !!
“प्रसून”
कैसे खिलें ‘डाल’ पर, मिले न ‘पानी-खाद’ ??
कैसे
उसे सुहायें ‘तितली-कलियों’ के ‘अनुराग’ ??
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